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श्वास पैटर्न · शांति

भ्रामरी: सुकून देने वाली गुंजन के साथ भ्रमर श्वास

4 सेकंड साँस लें, फिर 8 सेकंड तक गुनगुनाते हुए छोड़ें। यह कंपन मन को टिकने की कोमल जगह देता है।

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भ्रामरी का नाम काले भौंरे के लिए संस्कृत शब्द से आया है, क्योंकि साँस छोड़ते समय एकसार गुंजन की आवाज़ की जाती है। गुंजन निःश्वास को अपने आप लंबा करता है और ऐसा कंपन पैदा करता है जो चेहरे, सिर और सीने में महसूस होता है। बहुत लोगों को यह आवाज़ ही अपने में खींच लेती है, इसलिए जिन दिनों गिनना भारी लगे, उन दिनों भ्रामरी अच्छा विकल्प है।

कैसे करें

  1. आराम से बैठें, आँखें बंद करें और होंठ हल्के से मिलाएँ।
  2. नाक से 4 सेकंड तक साँस लें।
  3. भौंरे की तरह धीमी, एकसार "म्म्म" आवाज़ करते हुए 8 सेकंड तक साँस छोड़ें।
  4. चाहें तो अँगूठों से कानों के आगे के छोटे उपास्थि को दबाकर गुंजन भीतर से सुनें।
  5. साँस के अंत में गुंजन को अपने आप थमने दें, फिर दोबारा साँस लें।
  6. पाँच से दस चक्र दोहराएँ, फिर कुछ देर चुपचाप बैठें।

कब मदद करता है

परंपरा से भ्रामरी शाम को, ध्यान से पहले, या तब की जाती है जब मन का शोर तेज़ हो। चूँकि आवाज़ ख़ुद ध्यान को थामे रखती है, यह उन लोगों को भा सकती है जो मौन श्वास अभ्यास में बेचैन हो जाते हैं। ऐसी जगह करना सबसे आसान है जहाँ थोड़ी आवाज़ करने में झिझक न हो।

उत्पत्ति और शोध

भ्रामरी को हठ योग प्रदीपिका जैसे हठ योग ग्रंथों में शास्त्रीय प्राणायामों में गिना गया है। इससे जुड़ी एक जानी-मानी शारीरिक खोज है: वाइट्ज़बर्ग और लुंडबर्ग के 2002 के अध्ययन (American Journal of Respiratory and Critical Care Medicine) ने पाया कि गुनगुनाने से नाक की गुहा में नाइट्रिक ऑक्साइड का स्तर शांत निःश्वास की तुलना में काफ़ी बढ़ जाता है। ख़ुद भ्रामरी पर हुए अध्ययन छोटे हैं, और इसकी शांति देने वाली ख्याति मुख्यतः लंबे पारंपरिक उपयोग से आती है।

सुरक्षा

बैठकर या लेटकर करें; पानी में या गाड़ी चलाते समय कभी न करें। चक्कर आए तो रुक जाएँ।

धीमे गुनगुनाएँ; तेज़ आवाज़ की ज़रूरत नहीं। कान में संक्रमण हो तो कान न दबाएँ, और चक्कर आए तो रुक जाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या कान बंद करना ज़रूरी है?
नहीं। कान बंद करने से आवाज़ ज़्यादा भीतर की लगती है, पर खुले कानों से गुनगुनाना भी काम करता है।
किस सुर में गुनगुनाऊँ?
कोई भी आरामदायक धीमा या मध्यम सुर जिसे बिना ज़ोर लगाए एकसार रख सकें। कोई "सही" सुर नहीं है।
क्या बिना आवाज़ के कर सकते हैं?
गुंजन ही भ्रामरी का सार है। मौन चाहिए तो 4-8 आज़माएँ, जिसमें लंबा निःश्वास बिना आवाज़ के रहता है।

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